तारों वाली रात का आलम पीने और पिलाने से

साक़ी ने मय खींच के रख दी गोया दाने दाने से

तार-ए-गरेबाँ सीने वाले चाक-ब-दामन आए हैं
या'नी कुछ तक़दीर न सुलझी उलझी थी दीवाने से

रात नहीं ये ज़ीस्त का दिन है होश में आ बर्बाद न कर
शम्अ''' फ़क़त मेहमान-ए-सहर है कौन कहे परवाने से

दैर-ओ-हरम से उठने वाले आए हैं मयख़ाने में
इस पे अगर तक़दीर उठा दे जाएँ कहाँ मयख़ाने से

जोश-ए-जुनूँ सा रहबर हो तो होश की मंज़िल दूर नहीं
दीवाने ने राह बना दी बस्ती तक वीराने से

साक़ी के अंदाज़ को देखो बे-ख़ुद पीने वालों में
मिलती है मय क़िस्मत से गो बटती है पैमाने से

ज़र्फ़ मिरी क़िस्मत का भरा है आप निगाह-ए-साक़ी ने
पैमाने को ख़ुम से मिली और ख़ुम को मिली पैमाने से

उम्र-ए-दो-रोज़ा 'कैफ़ी' की यूँ कट ही गई यूँ कटनी थी
काम रहा पैमाने से और साक़ी के मयख़ाने से

— Kaifi Chirayyakoti

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