मेरे दिन इतनी तेज़ी से ढलने लगे

मैं रुका तो मिरे साए चलने लगे

जिस किसी के लिए अपनी मुट्ठी कसी
हाथ से रेत जैसे फिसलने लगे

तुम भी अच्छे लगे थे मुझे दूर से
तुम भी नज़दीक आ कर बदलने लगे

वक़्त ने वक़्त ऐसा दिखाया हमें
जो उगलते थे हम वो निगलने लगे

बे-वफ़ाई पे इक शे'र क्या पढ़ दिया
लोग कुर्सी पे चढ़ कर उछलने लगे

खेलने का कभी शौक़ बदला नहीं
सिर्फ़ अपने खिलौने बदलने लगे

— Yamir Ahsan

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Waqt Shayari

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