वस्ल भी हिज्र था विसाल न था

मिल रहे थे मगर ख़याल न था

मिल रहे थे कि दोनों तन्हा थे
गुफ़्तुगू में भी क़ील-ओ-क़ाल न था

मेरे और उस के दरमियान अभी
कोई भी सिलसिला बहाल न था

रास्ते ख़त्म हो चुके थे मगर
वापसी का कोई सवाल न था

ये भी इक मरहला तमाम हुआ
हो गए थे जुदा मलाल न था

वो तिरा हुस्न हो कि इश्क़ मिरा
कोई पाबंद-ए-माह-ओ-साल न था

— Yashab Tamanna

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Yaad Shayari

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