सुबुक होती हवा से तेज़ चलना चाहती हूँ

मैं इक जलते दिए के साथ जलना चाहती हूँ

ग़ुबार-ए-बे-यक़ीनी ने मुझे रोका हुआ है
ज़मीं से फूट कर बाहर निकलना चाहती हूँ

मैं ख़ुद सहमी हुई हूँ आइने के टूटने से
बहुत आहिस्ता सत्ह-ए-दिल पे चलना चाहती हूँ

नुमूद-ए-सुब्ह से पहले का लम्हा देखने को
अँधेरी रात के पैकर में ढलना चाहती हूँ

मैं शहर-ए-शब को आँखों की दुआ देने से पहले
दर-ओ-दीवार का चेहरा बदलना चाहती हूँ

किसी के ख़्वाब की तकमील में पत्थर हुई थी
अब अपने ख़्वाब की लौ से पिघलना चाहती हूँ

— Yasmeen Hameed

More by Yasmeen Hameed

Other ghazal from the same pen

See all from Yasmeen Hameed →

Andhera Shayari

Shers of andhera.

All Andhera Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling