साथ तेरे और चल सकता नहीं
राख हूँ अब और जल सकता नहीं
आँधियाँ आएँ कि अब तूफ़ाँ चलें
राह अपनी मैं बदल सकता नहीं
थक गया हूँ बे-सबब चलते हुए
इश्क़ में अब और चल सकता नहीं
जिस्म की बेताबियों से मात खा
रूह को अब और छल सकता नहीं
छोड़ दूँगा ये जहाँ तेरे लिए
अब तुझे मैं और खल सकता नहीं
कब तलक पानी से मैं डरता रहूँ
बर्फ़ हूँ पर और गल सकता नहीं
रात से मैं दोस्ती कैसे करूँ
सूर्य हूँ अब और ढल सकता नहीं
— Yogendra Singh Raghuwanshi















