aise us haath se gire ham log | ऐसे उस हाथ से गिरे हम लोग

  - Zia Mazkoor

ऐसे उस हाथ से गिरे हम लोग
टूटते टूटते बचे हम लोग

अपना क़िस्सा सुना रहा है कोई
और दीवार के बने हम लोग

वस्ल के भेद खोलती मिट्टी
चादरें झाड़ते हुए हम लोग

उस कबूतर ने अपनी मर्ज़ी की
सीटियाँ मारते रहे हम लोग

पूछने पर कोई नहीं बोला
कैसे दरवाज़ा खोलते हम लोग

हाफ़िज़े के लिए दवा खाई
और भी भूलने लगे हम लोग

ऐन मुमकिन था लौट आता वो
उस के पीछे नहीं गए हम लोग

  - Zia Mazkoor

Mulaqat Shayari

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    तुम ने भी उन से ही मिलना होता है
    जिन लोगों से मेरा झगड़ा होता है

    उस के गाँव की एक निशानी ये भी है
    हर नलके का पानी मीठा होता है

    मैं उस शख़्स से थोड़ा आगे चलता हूँ
    जिस का मैं ने पीछा करना होता है

    बस हल्की सी ठोकर मारनी पड़ती है
    हर पत्थर के अंदर चश्मा होता है

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    ताश में जैसे हुकुम का इक्का होता है

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    Zia Mazkoor
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    हमारे साथ कोई मसअला फुरात का है
    वगरना इल्म उसे अपनी मुश्किलात का है

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    तुम्हारे पास तो दफ़्तर शिफारिशात का है

    हमारी बात का जितना वसीअ पहलू है
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    Zia Mazkoor
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    Zia Mazkoor
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    बिन देखे ईमान नहीं ला सकता मैं
    और वो ग़ैर-यक़ीनी बातें करते हैं

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    दुनियादार ही दीनी बातें करते हैं
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    Zia Mazkoor
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