"मैं सोचता हूँ"
बैठे बैठे बात ये मैं सोचता हूँ
मेरी क़िस्मत क्यूँ नहीं उस के ही जैसी
सुब्ह होते करती हो मैसेज जिस को
उस का दिन बन जाता होगा और उस को
कोई भी तकलीफ़ थोड़ी होती होगी
'इत्र तो अब वो लगाता भी न होगा
हाँ गले जो तुम लगाती हो उसे अब
राब्ता भी करते होंगे सब कि ख़ाली
बेचे उन को ही पसीने वस्ल वाले
बनते हैं दोनों के ही अब दरमियाँ से
तुम उसे जो छूती हो तो देखना अब
लक़्वा सारी उम्र मारेगा ही कैसे
क्योंकि मुझ को याद है जब आई थी घर
और हम सोए थे जिस खटिये पे उस
में
थे उड़स जो फिर कहीं गुम हो गए और
मेरे घर में इक अलग सी थी रवानी
सुब्ह लोगों ने कहा हीरा मिला क्या
रात भर उस की चमक थी मेरे घर में
ख़ैर अब उस को सभी ये कहते होंगे
पूछते हैं लोग कि हीरा कहाँ है
बेचा क्यूँ उस लड़के को और कितना पाया
मैं परेशाँ हूँ इन्हें क्या ही बताऊँ
सिर्फ़ हीरा ही नहीं वो मेरी जाँ है
नूर है वो ज़िंदगी का मेरे लेकिन
उस ने ठाना है मुझे तोड़ेगी ऐसे
आइना जैसे गिरे सौ फ़ीट से तो
मेरी भी ख़्वाहिश यही बस रह गई है
टूट के उस के ही हाथों है बिखरना
कौन पागल चाहता है ऐसे जीना
ये बदन होगा अकेला क़ब्र में पर
दूर उस से मर के रहना अच्छा होगा















