मेरे पापा
मुँह पर ज़रा न करते थे तारीफ़ें वो
पीछे बड़े क़सीदे कसते थे पापा
बे-फ़िक्र अलमस्त और मन-मौजी से थे
सब को हँसी-ख़ुशी में रखते थे पापा
ख़ुद पर ही क़हक़हे लगा कर वो अक्सर
ग़फ़लत को सीधा कर लेते थे पापा
बेख़ौफ़ ही रहे क़ाइदों से दुनिया के
मग़रूर हाकिमों से लड़ते थे पापा
अल्हड़ ख़ुद्दार तो रहे वो दफ़्तर में
घर में अक्सर झगड़ा करते थे पापा
शिकवों से कोसों दूरी से बचपन में
झाड़ू बेचा कर के पढ़ते थे पापा
हाँ हिंदी-मीडियम से ही थे पढ़े मगर
अंग्रेज़ी फटकार लगाते थे पापा
शे'र का बच्चा कहते थे मुझ को कुछ यूँ
ख़ुद की तारीफ़ें कर लेते थे पापा
जिन को बस सुन कर ही मैं हँस देता था
ऐसे ख़्वाब दिखाया करते थे पापा
कर के स्कूल का पढ़ा दर-किनार वो
एक क्लास अलग से लगाते थे पापा
बे-ख़ौफ़ सा चला करता मैं साथ उन के
मेरे ख़याली भूत भगाते थे पापा
थकते न इम्तिहानों को लिखते सौ बार
मीलों-मील चला यूँ करते थे पापा
भागे रहते थे जिस छुरी से दूर सदा
आख़िर गले उसी के लगते थे पापा
मौत से इक दो सालों की छुट्टी ले कर
शिकवे सब से समेटे रहते थे पापा
माँ को तुम्हारी ले आता मैं वापस काश
गिला ज़रूर मगर ये करते थे पापा
सब स्वीकारा अपने छोटे जीवन में
हार न ये पर माना करते थे पापा
अपनी दुनिया के गुमनाम सी राहों में
माँ को हर-जा ढ़ूॅंढा करते थे पापा
सब देकर अपना हम को तन्हा इक रोज़
शहर से खोज उसी में निकले थे पापा
अक्स आप का रहेगा ज़िंदा मुझ
में ये
कहता पर अब कैसे बतलाएँ पापा
शर्ट आप की मैं आज भी पहने फिरता हूँ
ये सादगी न मगर ओढ़ी जाए पापा















