"सैर अजायबघर की"
ये इक इंसानी फ़ितरत है जब तक वो
नाम न दे कोई शय को उस का तब तक
कोई संजीदा शय मानेगा न उसे
नाम नहीं तो जैसे कुछ हस्ती ही नहीं
तो सोचा ये क्यूँ न मैं अपनी हस्ती को
कोई नाम अता करने का काम करूँ
मिरे ख़याल में तो ये
नाम अजायबघर अच्छा होगा शायद
सारी इंसानियत का तो मैं क्या बोलूँ
कम से कम मैं मेरी ज़ात के डेरों का
इक मज्मूआ सा हूँ
वो इस लिए ही क्यूँकि मैं जब भी
किसी मक़ाम पे इक अपने से बिछड़ा तो
फिर इक हिस्सा मेरा वही पे क़ैद हुआ
अपने के इंतिज़ार में या उस के साथ
जैसे अजायबघर की चौकी हो कोई
उन डेरों में
मैं दरबान सा हर पास आते साए में
बिछड़े शख़्स को खोजा करता हूँ हर दम
ये सोच कर के शायद इस
में वो मिल जाए
वैसे मेरी इक दरख़्वास्त थी तुम से ये
गर तुम भी मुझ से मिलने आते हो तो
क्या तुम उन चौकियों को अपने साथ समेट
ले आओगे
या कम से कम उन को देख ही आना तुम
ऐसा है गर उन चौकियों से पार नहीं
गुजरे तो तुम मुझ से नहीं मिले हो बल्कि
मेरे नाम के इक पैकर से मिले हो फिर
ख़ैर ये भी है मुझ से मिल के क्या होगा
जो तुम भी बिछड़े तो इस मजमूए में
शामिल हो कर रह जाओगे
अपनी चौकी में आराम से रहना फिर
क्या है ना कि नए सब अपनों में अक्सर
ख़ूब तलाशे तुम जाओगे















