"तदबीर"
आजकल ज़िंदगी मुझे क्यूँ ये
आश्नाओं सी रास आती है
रोज़ बाद-ए-सबा यहाँ कैसे
ख़्वाब जैसे पयाम लाती है
सुब्ह बुझते हुए सभी तारे
इन दिनों हाल पूछ लेते हैं
गर्म-चश्में कड़क सी सर्दी में
किस तरह मुझ को खोज लेते हैं
मेरी राहों के फूल-पत्ते ये
सब मिरे साथ में टहलते हैं
आज ऊँचे दरख़्त भी झुक कर
छाँव मुझ को शदीद देते हैं
वादियाँ और ये पहाड़ सभी
गर्म-जोशी के साथ मिलते हैं
चाँद-सूरज नए लिबासों में
कुछ अदब से सलाम करते हैं
काम सब भूल कर ये पंछी भी
ख़ास नग़्में नुमायाँ करते हैं
इत्तिफ़ाक़न नहीं मुझे तो ये
सब तिरे इंतिज़ाम लगते हैं
— kapil verma















