सभी को इश्क़ यारी लग रही है
सो ये आदत तुम्हारी लग रही है
बिछड़ने का इरादा कैसे कर लूँ
तू अब भी उतनी प्यारी लग रही है
वो मिलता है मगर नज़रें झुकाकर
बदन की पहरे-दारी लग रही है
ये किस ने हाल पूछा है हमारा
ये किस को ग़म-गुसारी लग रही है
नहीं ये हिज्र के आँसू नहीं हैं
ये कोई बर्फ़बारी लग रही है
कोई शीशा यहाँ टूटा नहीं है
मुझे ये दिल फ़िगारी लग रही है
वो फिर है तोड़ने निकली दिलों को
अतुल बारी तुम्हारी लग रही है
— ATUL SINGH















