मोहब्बत में जो ग़म सहते नहीं हैं
मुकम्मल शख़्स वो रहते नहीं हैं
नहीं होते किसी मतलब के आँसू
जो दरिया की तरह बहते नहीं हैं
ज़बाँ है तो ज़बाँ से काम लो फिर
वो मुर्दे हैं जो कुछ कहते नहीं हैं
वो तूफ़ाँ है तो फिर डरना नहीं है
जो पर्वत हैं कभी ढहते नहीं हैं
— Aditya















