Aditya
Aditya
Ghazal

पढ़ी जब सफ़र की दुआ चलते-चलते

पता ना चला रास्ता चलते-चलते

सफ़र का मज़ा आएगा चलते-चलते
मिलेगा नया रास्ता चलते-चलते

किसी ने पुकारा हो ज्यूँ नाम मेरा
गुमाँ सा हुआ बारहा चलते-चलते

फिर उस की अदा में हुआ इक इज़ाफ़ा
दिखा जब उसे आइना चलते-चलते

था उस का चलन भी इरेज़र के जैसा
मिटाया हर इक राब्ता चलते-चलते

चरागो़ की शिद्दत के आगे भी अक्सर
ठहर जाती है ये हवा चलते-चलते

है उल्फ़त फ़रोशी मिरा काम मुझ को
मिलेंगे कई हम-नवा चलते-चलते

यूँ बैठे हुए दूरियाँ कम न होंगी
मिटेगा फ़क़त फ़ासला चलते-चलते

— Aditya

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