पढ़ी जब सफ़र की दुआ चलते-चलते
पता ना चला रास्ता चलते-चलते
सफ़र का मज़ा आएगा चलते-चलते
मिलेगा नया रास्ता चलते-चलते
किसी ने पुकारा हो ज्यूँ नाम मेरा
गुमाँ सा हुआ बारहा चलते-चलते
फिर उस की अदा में हुआ इक इज़ाफ़ा
दिखा जब उसे आइना चलते-चलते
था उस का चलन भी इरेज़र के जैसा
मिटाया हर इक राब्ता चलते-चलते
चरागो़ की शिद्दत के आगे भी अक्सर
ठहर जाती है ये हवा चलते-चलते
है उल्फ़त फ़रोशी मिरा काम मुझ को
मिलेंगे कई हम-नवा चलते-चलते
यूँ बैठे हुए दूरियाँ कम न होंगी
मिटेगा फ़क़त फ़ासला चलते-चलते
— Aditya















