सच है कि मुझको तुम सेे मोहब्बत नहीं रही
हाँ तुमको देखने की भी हसरत नहीं रही
अब तुमको रोकने के लिए रोऊँगा नहीं
अब जाओ मेरी पहले सी आदत नहीं रही
मेरे बगीचे में नए पौधे उगे मुझे
सूखे हुए शजर की ज़रूरत नहीं रही
जब से निकल पड़ा हूँ मैं ख़ुद की तलाश में
फिर सांस लेने तक की भी फुर्सत नहीं रही
मेरी ग़ज़ल में अब भी है चर्चा तेरा मगर
अब तेरे हुस्न की कोई कीमत नहीं रही
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