Aditya
Aditya
Nazm

अधूरा सफ़र

तुम्हारे ख़्वाब की प्यासी मेरी आँखें ने पूछा है
कि मैं ने टूटते तारों से तुम को क्यूँ नहीं माँगा
ख़ुदा के दर पे जा कर अपने सर को क्यूँ नहीं फोड़ा
उन्हें लगता है मुझ को इश्क़ करना ही नहीं आया
तुम इक दिन रू-ब-रू आ कर कोई क़िस्सा सुना दो ना
मुझे तो कुछ समझ आता नहीं उन को बताएं क्या

गुजरते वक़्त रस्तों से दरख़्तों ने मुझे टोका
कि जिन के छांव में हम ने कभी सपने उगाए थे
खिजां सी छा गई उन पर अकेला देख कर मुझ को
बहुत अफ़सोस था उन को कि अपने इश्क़ के सपने
मुहब्बत की बहारों के बिना वो टूट कर बिखरे

सितारे काली रातों के अमावस का वो काला चाँद
अभी भी तुझ से मेरे बस्ल के सपने सजाते हैं
यक़ीं उन को है अब भी फिर से तू मेरी हो जाएगी
मगर मुझ को नहीं लगता कि अब तेरा इरादा है
अगर तेरा इरादा हो भी जाए फिर भी मत आना

अगर तुम लौट के आए तो फिर जाने नहीं दूँगा
परिंदे की तरह तुम को मैं ख़ुद में क़ैद कर लूंगा

सफ़र वो जिन को मिल कर के हमें अंजाम देना था
मुकम्मल इश्क़ कर, जिन को हमें ईनाम देना था
हमारी राह तकते आँख से महरूम हो बैठे
भटकते फिर रहें हैं अब किसी अंजान रस्ते पर
सभी से पूछते तेरी गली तेरा पता-ओ-दर
उन्हें लगता है ये तू बात उन की मान जाएगी
हमारी ज़िन्दगी में फिर तू वापस लौट आएगी

— Aditya

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