क़ासिद
सब ज़ाविये समेट के लाया हूँ इस नज़्म ए मुसम्मत में
क़ासिद दिल की सारी बातें मैं ने लिख दी हैं ख़त में
पहले मिसरे में है रवानी नदिया जैसे बहती जाए
दूजा मिसरा पढ़ कर मुझ को समझेगी वो नस्र-निगार
क़ासिद सुन हड़बड़ी न करना पिछली बार के जैसे तू
क़ासिद ख़त पहुँचाना बिल्कुल सही पते पर अबकी बार
मैं भी पागल हूँ रातों में लिखता हूँ पैग़ाम नए
कोई जवाब न देने की उस ने भी ठान रखी है ज़िद
मुझ को भी सब भूल चुके हैं लोग कभी जो अपने थे
कौन समझ पाएगा तेरा दर्द सिवा मेरे क़ासिद
सच बोलूँ तो दिन वो पुराने क़ासिद अब याद आते हैं
मैसेज में कब दिल के सब जज़्बात बयाँ हो पाते हैं















