ना किसी से आस, रहमत ख़ुद-कुशी

मौत से बेकार, आफ़त ख़ुद-कुशी

महफ़िलों में जब सुनाया सब हंसे
है लतीफ़ा या सियासत ख़ुद-कुशी

वो मुझे रोने नहीं देते मगर
बोलते हैं सब जहालत ख़ुद-कुशी

बेबसी कुछ इस तरह घेरे मुझे
ज़िंदगी की एक क़ीमत ख़ुद-कुशी

रात के ही बा'द होती है सुब्ह
है ग़लतफ़हमी कि नेमत ख़ुद-कुशी

गर सुकूँ ख़ुद को मिटा कर ना मिला
है जहन्नम की अज़िय्यत ख़ुद-कुशी

— kanak anamika khantwal

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