सब जिसे माहताब कहते हैं
तेरे रुख़ का शबाब कहते हैं
बर्ग-ए-गुल सी है नाज़ुकी उन की
हम लबों को गुलाब कहते हैं
लोग आँखों से पी बहकते हैं
चश्म जाम-ए-शराब कहते हैं
गेसुओं से टपकती बूंदों को
अब्र से गिरता आब कहते हैं
तेरी पाज़ेब की हुई रुनझुन
बज रहा जि
यूँँ रबाब कहते हैं
दूर हो कर भी पास लगती हो
क्या इसी को सराब कहते हैं
पढ़ सकोगे 'अनीस' चेहरे को
लोग इस को किताब कहते है
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