सब खड़े सुब्ह-ओ-शाम हम तो नहीं
उन के दर के ग़ुलाम हम तो नहीं
आप क्यूँ ला-क़लाम हैं हम से
आपसे हम-क़लाम हम तो नहीं
हम को भी दी ज़बान रब ने, मगर
आपसे बे-लगाम हम तो नहीं
मय-कदे में ज़रूर बैठे हैं
पर तलबगार-ए-जाम हम तो नहीं
दाद-ओ-तहसीन आप की पाएँ
ऐसे भी ख़ुश-क़लाम हम तो नहीं
ओक से मय पियें तेरी साक़ी
इतने भी तिश्ना-काम हम तो नहीं
क़ाबिले-एहतराम आप हैं बस
क़ाबिले-एहतराम हम तो नहीं
हम कोई ख़ास तो नहीं हैं 'अनीस'
लेकिन इतने भी आम हम तो नहीं
— Anis shah anis















