dhoop itni hai ki chaaya bhi thikaana chahti hai | धूप इतनी है कि छाया भी ठिकाना चाहती है

  - Prashant Arahat

धूप इतनी है कि छाया भी ठिकाना चाहती है
आज कल वो साथ मेरा छोड़ जाना चाहती है

चाहती है साथ देना हर घड़ी में हर समय पर
चिलचिलाती धूप में दामन बचाना चाहती है

रूह मेरी क़ैद होकर रह गई है जिस्म में ही
वो बहुत जल्दी ही इस सेे भाग जाना चाहती है

दरमियाँ शय है हमारे तुम उसे कुछ नाम दे दो
जो तुम्हें मुझ सेे मुझे तुम सेे मिलाना चाहती है

रास्ते सब के सभी उस ओर ही जाकर मिले हैं
ज़िंदगी ये जिस तरफ़ लेकर के जाना चाहती है

नाम उसका है बहुत प्यारा मगर ये आरज़ू है
बस मिरा सरनेम वो पीछे लगाना चाहती है

  - Prashant Arahat

Life Shayari

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