संधि की शर्तों पे क़ाएम हो गई है दोस्ती
अब नए आयाम गढ़ती जा रही है दोस्ती
कॉल तुमने काट दी ये बोलकर मैं व्यस्त हूँ
झूठ ये पहचान कर उस पर हँसी है दोस्ती
देखकर लहजा तुम्हारा सोचता हूँ मैं यही
दुश्मनी तुम सेे भली है या भली है दोस्ती
ये नज़र-अंदाज़ करने की हदें सब देखकर
रेतकर अपना गला अब मर रही है दोस्ती
भावना से जो घिरे हैं वो तो धोखा खाएँगे
आज कल उनके लिए मीठी छुरी है दोस्ती
फ़र्क़ इतना है तुम्हारे और मेरे बीच में
नफ़रतें तुमने चुनी मैंने चुनी है दोस्ती
शा'इरी पढ़कर मेरी 'अरहत' समझते हो मुझे
बाद में पछताओगे तुम सेे नई है दोस्ती
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Prashant Arahat
our suggestion based on Prashant Arahat
As you were reading Friendship Shayari Shayari