"ख़्वाब"

ख़्वाब ये है कि मेरी ज़ात रहे लासानी
ख़्वाब ये है कि मेरी ज़ीस्त रहे सुलतानी
ख़्वाब ये है कि मेरे काम में हंगामा हो
ख़्वाब ये है कि मेरी बात हुकमनामा हो
ख़्वाब ये है कि दहकता हुआ इक शो'ला बनूँ
ख़्वाब ये है कि मैं सूरज की सिफ़त गोला बनूँ
ख़्वाब ये है कि लड़ूँ जंग और लश्कर रखूँ
ख़्वाब ये है कि सिकन्दर को भी नौकर रखूँ
ख़्वाब ये है कि पहाड़ों को कुचल डालूँ मैं
ख़्वाब ये है कि समुंदर को निगल डालूँ मैं
ख़्वाब ये है कि ज़माने को मैं रौशन कर दूँ
ख़्वाब ये है कि हर इक ख़ार को गुलशन कर दूँ
ख़्वाब ये है कि तमन्नाओं के सब पर खोलूँ
ख़्वाब ये है कि ख़लाओं में भी दफ़्तर खोलूँ
जो भी हालात हों हर हाल में बढ़ना है मुझे
सारे ख़्वाबों को हक़ीक़त में बदलना है मुझे

— Ashraf Ali

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