लगी है इश्क़ की आदत मुझे तुम याद आती हो
मुझे है इस से ही राहत मुझे तुम याद आती हो
गुज़रती है मिरी शब भी तुम्हारे ही ख़यालों में
सहर में ख़्वाब की सूरत मुझे तुम याद आती हो
ज़माना ये समझ सकता नहीं हैं इश्क़ को अपने
सभी को है यहाँ हैरत मुझे तुम याद आती हो
हमें कर के जुदा भी ख़ुश नहीं हैं ये जहाँ वाले
है इनको ये भी तो दिक़्क़त मुझे तुम याद आती हो
किसी के हुस्न की चाहत न कोई ख़्वाब हो ता'बीर
मुझे तो इस से है रग़बत मुझे तुम याद आती हो
न कोई ग़म अगर रिश्ता मुकम्मल हो नहीं पाया
ख़ुदा की ये भी है रहमत मुझे तुम याद आती हो
तुम्हारा साथ हासिल है किसी को गर नसीबों से
मिरी भी इतनी है क़िस्मत मुझे तुम याद आती हो














