मुझमें कोई तो है शायद ज़िंदा हैतेरा अक्स अभी भी कुछ ताबिंदा हैप्यास लगी थी उस को तो पानी पीतामटके फोड़ रहा क्यूँ कोई परिंदा हैछोड़ गई थी जो लड़की पुरवाई मेंअब वो अपनी करनी पर शर्मिंदा हैजिस के पास नहीं आवर्त कोई काँसाआख़िर वो किन रस्तों का बाशिंदा है— Ayush Aavart