ये माँ की बोलियाँ ही जानती हैं
सुलाना लोरियाँ ही जानती हैं
क़फ़स में क़ैद पंछी के दुखों को
फ़क़त हम लड़कियाँ ही जानती हैं
मुहब्बत कौन किस से कर रहा है
ये बातें चिट्ठियाँ ही जानती हैं
हक़ीक़त तो तवायफ़ के जहाँ की
अकेले कोठियाँ ही जानती हैं
घरों के टूटने का ग़म तो यारों
यहाँ मधुमक्खियाँ ही जानती हैं
सही हैं ज़िल्लतें जितनी भी मैं ने
उसे ख़ामोशियाँ ही जानती हैं
— Bhoomi Srivastava















