बात इक दिल की दिल में दबी रह गई
उस के होंठों पे बस ख़ामुशी रह गई
ले गया उस को आख़िर कोई नाखलफ़
मेरे हिस्से में बस शा'इरी रह गई
झूठ बाज़ार में आके बिक भी गया
सच की क़ीमत लगी की लगी रह गई
फूल सारे ही कोई चुरा ले गया
तितलियाँ सारी बेबस खड़ी रह गई
क्या बताऊ कि वो मेरी क्या लगती थी
इक परी जो मुझे देखती रह गई
— Daqiiq Jabaalii















