रास्ता हो या कोई दीवार साईं
दोस्त हों तो हो ही जाते पार साईं
ज़िंदगी से इसलिए ही लड़ रहा हूँ
ज़िंदगी से करता हूँ मैं प्यार साईं
आदमी तो आदमी है 'इश्क़ खोकर
राम जी भी हो गए बेज़ार साईं
बचपने में ख़्वाब होते थे बड़े सब
अब हमारा ख़्वाब है इतवार साईं
बीच में घर-बार है उस पार है वो
भेज दे महबूब को इस पार साईं
अब नहीं दिखते शजर उन खिड़कियों से
खुल गया है अब वहाँ बाज़ार साईं
रात दिन की ये कुढ़न उफ़ हाए रब्बा
अब नहीं जँचता मुझे संसार साईं
'इश्क़ का मतलब फ़क़त अब जिस्म से है
घट रहा है 'इश्क़ का मेयार साईं
चाहता 'देवांश' भी है ख़ूब हँसना
कर रहा है दिल मगर इनकार साईं
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