haan doolhe ko bhi tha shrngaar ka dukh | हाँ दूल्हे को भी था शृंगार का दुख

  - "Dharam" Barot

हाँ दूल्हे को भी था शृंगार का दुख
ये औरत का तो है हर बार का दुख

नहीं रुकती कभी इच्छा की यात्रा
ये बाइक बाद आता कार का दुख

बताएँगे सभी क्या थी कमी पर
खिलाड़ी जानता है हार का दुख

फ़साना लगता है आसान जिनको
पड़ेगा झेलना इनकार का दुख

फ़क़त इज़हार करना है तुम्हें यार
उन्हें है झेलना इक़रार का दुख

दिया हम सबको था सालों से ही बाँट
मज़े है फिर भी है सरकार का दुख

अभी ये हाल है जो मीडिया का
कभी होता था वो अख़बार का दुख

निकालों तुम कमी हर दिन हमारी
रखो मत पास मैं के भार का दुख

तेरी बातें कहाँ समझे 'धरम' लोग
नया होता नए फ़नकार का दुख

  - "Dharam" Barot

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