हुस्न के चक्कर से बाहर आ गए
अब तो हम दोनों बराबर आ गए
ये उदासी ये थकन मिट जाएगी
हम सफ़र से लौट के घर आ गए
मेरे हिस्से एक क़तरा भी नहीं
उस के हिस्से में समुंदर आ गए
इश्क़ के पर्चे में उस के नाम से
मेरे अच्छे ख़ासे नंबर आ गए
ज़िंदा थे तो तैरना आया नहीं
मर गए तो झट से ऊपर आ गए
आप वापस लौटने वाले थे ना
आप कैसे दिल के अंदर आ गए
याद रहता ही नहीं कुछ आजकल
छुट्टी के दिन पे भी दफ़्तर आ गए
— Dileep Kumar















