इक आदमी भी जब नहीं राज़ी लतीफ़ों के लिए
फिर तो बचा ही कुछ नहीं हैं हम दरख़्तों के लिए
जो ज़हर फैलाने लगी है हर तरफ़ से हर कहीं
कोई दवा है तो बताओ उन हवाओं के लिए
किस बात पर तुम ने भरोसा कर लिया उस शख़्स का
मशहूर है जो शहर भर में बस फ़सानों के लिए
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