वो शजर से जो फूल उतारे थे

याद आया कि वो तुम्हारे थे

मैं तो ख़ुशबू तलाशने निकला
ज़ीस्त में मेरे ख़ार सारे थे

तू न था ज़िंदगी में जब मेरे
मेरी ग़जलों में चाँद तारे थे

दाव जिस में कि जीत मेरी थी
तेरी ख़ातिर वो दाव हारे थे

आज तक मुझ को है गुमाँ उनपे
वो ख़सारे भी क्या ख़सारे थे

— Aadi Ratnam

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