तुम्हारे ही रहेंगे ज़िंदगी-भर

कँवारे ही रहेंगे ज़िंदगी-भर

उदासी ज़िंदगी-भर की रहेगी
ख़सारे ही रहेंगे ज़िंदगी-भर

इशारे ही इशारे थे मुसलसल
इशारे ही रहेंगे ज़िंदगी-भर

सितारे ही रहे मेरी ग़ज़ल में
सितारे ही रहेंगे ज़िंदगी-भर

नदी का ख़ूब-सूरत पैरहन तो
किनारे ही रहेंगे ज़िंदगी-भर

तिरे जैसी हक़ीक़त ही रहे तो
नज़ारे ही रहेंगे ज़िंदगी-भर

उजाले बे-इरादा लौटने से
शरारे ही रहेंगे ज़िंदगी-भर

कोई भी दूसरा चारा नहीं है
तुम्हारे ही रहेंगे ज़िंदगी-भर

— Ajay Kumar

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