"जंगल"
रोज़ शाम आती है
और वो बताती है
पहले सब मुकम्मल था
ये उजाड़ जंगल था
जो तमाम पत्थर हैं
शोर के वो मंज़र हैं
शोर भी मशीनों का
पेड़ों का ज़मीनों का
और हसरतों का था
शोर नफ़रतों का था
जो उठा था ग़ारों से
उजड़े इन दयारों से
एक शोर पल पल था
ये उजाड़ जंगल था
— Ajay Kumar















