ज़िंदगी में अब कहीं ठहराव आना चाहिए
नाव में थोड़ा बहुत उलझाव आना चाहिए
तू ने जो बख़्शे मुझे वो ज़ख़्म सारे भर चुके
तेरी जानिब से नया अब घाव आना चाहिए
जब पहुँच जाऊँ कभी मैं क़ैस के में'यार तक
मेरे हिस्से में भी तब पथराव आना चाहिए
गर उतरना है जनाब-ए-इश्क़ के मैदान में
कुछ बिछड़ने का भी तुम को दाव आना चाहिए
ख़ुद को ले आया हूँ ख़ालिद मैं भरे बाज़ार में
मेरा भी यूसुफ़ के जितना भाव आना चाहिए
— Khalid Azad















