बेनाम उदासी
वो एक बे-नाम सी उदासी
जो एक मुद्दत से शाम ढलते ही
फाटकों और खिड़कियों से
हवा के हाथों में हाथ डाले
हमारे कमरे में आ रही थी
कहाँ गई वो
— Khan Janbaz
वो एक बे-नाम सी उदासी
जो एक मुद्दत से शाम ढलते ही
फाटकों और खिड़कियों से
हवा के हाथों में हाथ डाले
हमारे कमरे में आ रही थी
कहाँ गई वो
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