उस के कूचे से जब भी गुज़रते हैं
ज़ेहन में बादल ग़म के उभरते हैं
काम न आती है बंदगी कोई
आशिक़ जब वादे से मुकरते हैं
उस के हुस्न का कहना ही क्या यारों
बिखरता हूँ मैं जब वो सँवरते हैं
इन ख़्वाबों को सहेज तो लूँ मगर
टूटे इक तो बाक़ी बिखरते हैं
शायरी वो फ़न है यारों जिस से
आशिक़ी के अंदाज़ निखरते हैं
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