आँख के पर्दे हटा कर मैं वहाँ हूँ देखता
मेरा दिल था लापता तेरा मकाँ हूँ देखता
बुझ गया सूरज इधर और चाँद फिर जलने लगा
आँख भर कर जब कभी मैं आसमाँ हूँ देखता
यूँँ न हो अब जल उठूँ मैं इस हवा के साथ में
जब हवा में हर जगह तेरे निशाँ हूँ देखता
रूह जैसे जा रही हो ज़िंदगी से ही मेरी
दूर बस जाते हुए मैं अपनी जाँ हूँ देखता
जब कभी पहचान करनी हो यही बस देखना
मैं परखने के लिए सबकी ज़बाँ हूँ देखता
सोचते सब बुझ गया हूँ राख मेरी देख कर
आसमाँ में उठ रहा मैं तो धुआँ हूँ देखता
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Divya 'Kumar Sahab'
our suggestion based on Divya 'Kumar Sahab'
As you were reading Paani Shayari Shayari