Kunu
Kunu
Ghazal

कुछ नहीं अब यहाँ बचा मेरा

नीम-जाँ तक ज़बूँ अदा मेरा

और भी थे क़दम गदाई के
यार वो खा गया क़ज़ा मेरा

ज़िंदगानी रफ़ू हुई ऐसे
गुफ़्तगू भी ज़ियाँ नुमा मेरा

चार अहल-ए-सुख़न मुक़र्रर थे
तब कहीं पर अयाँ ख़ता मेरा

वो चली थी हवा कहीं से तो
राहज़न यूँ कहाँ वफ़ा मेरा

बे-मज़ा लब पिए नहीं कामिल
था उसी दर्द का नशा मेरा

— Kunu

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