कुछ नहीं अब यहाँ बचा मेरा
नीम-जाँ तक ज़बूँ अदा मेरा
और भी थे क़दम गदाई के
यार वो खा गया क़ज़ा मेरा
ज़िंदगानी रफ़ू हुई ऐसे
गुफ़्तगू भी ज़ियाँ नुमा मेरा
चार अहल-ए-सुख़न मुक़र्रर थे
तब कहीं पर अयाँ ख़ता मेरा
वो चली थी हवा कहीं से तो
राहज़न यूँ कहाँ वफ़ा मेरा
बे-मज़ा लब पिए नहीं कामिल
था उसी दर्द का नशा मेरा
— Kunu















