होंठों पर उसके इक तिल था
आया जिस पर मेरा दिल था
उसकी संगत भारी पड़ती
अक्सर बढ़ता मेरा बिल था
जो भी उस सेे मिलकर बिछड़ा
वो तो मरता फिर तिल तिल था
दो नज़रों से मारा करता
ऐसा इकलौता क़ातिल था
जात अलग थी, मेरी उसकी
फिर तो बिछड़ना मुस्तक़बिल था
जब से उसको क्या देखा है
मनोज भी उसका आमिल था
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