ख़ुद से तुझे हटा रहा हूँ मैं
ख़ुद को बहुत सता रहा हूँ मैं
उसने जगाया रातों को मुझको
रातों को अब जगा रहा हूँ मैं
हक़ तू नहीं समझ रही तो क्या
हक़ तुझपे तो जता रहा हूँ मैं
इज़्ज़त तेरी बचानी है मुझको
हरक़त तेरी दबा रहा हूँ मैं
मालूम है ग़लत थी तू फिर भी
सबको ग़लत बता रहा हूँ मैं
बस में तुझे बिठा दिया ज़िन्दा
लाश ख़ुद को बना रहा हूँ मैं
घर पर बहन जवान बैठी है
बस इसलिए कमा रहा हूँ मैं
ग़म से हुई है 'देव' की यारी
हर ग़म पे मुस्कुरा रहा हूँ मैं
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