याद के शहर में खो गया दिल मिरा
तेरी दहलीज़ पर सो गया दिल मिरा
शौक़ के दश्त में देखते देखते
बोझ सा हिज्र का ढो गया दिल मिरा
दिन किसी तौर इस ने गुज़ारा मगर
रात जब आई तो रो गया दिल मिरा
कौन जाने मुझे किस की हसरत रही
कौन जाने कहाँ खो गया दिल मिरा
अब किसी से भी शिकवा नहीं कुछ मगर
अब ये किस बात पर रो गया दिल मिरा
और क़ातिल अदाएँ दिखाओ न यूँ
बस करो हुस्न वालो गया दिल मिरा
— MIR SHAHRYAAR















