इक नया साथी मिल गया है मुझे
फिर भी वो ग़म सता रहा है मुझे
उस को हूँ खोने में लगा मैं मगर
फिर भी अंदर मेरे मिला है मुझे
उस ने तो चोर ही दिया है मगर
उस के आने की आशना है मुझे
मुझ को अब आइने का क्या करना
उस की आँखें ही आइना है मुझे
उस को छुप कर के देखता हूँ मैं
वो कि चुप के से देखता है मुझे
मैं अकेले में सोचता हूँ ये
क्या कभी तू भी सोचता है मुझे
— Ammar 'yasir'















