रहती थी इक पहाड़ पे रानी ग़रीब की
तुम सुन के क्या करोगे कहानी ग़रीब की
उसने दिया था मुझको जो मिट्टी का इक चराग़
अब भी है मेरे पास निशानी ग़रीब की
अल्लाह जाने कौन सा ग़म था उसे मगर
कल रो रही थी ज़ोर से नानी ग़रीब की
बेटी की उसकी आज तो बारात आई है
इज़्ज़त है सबको आज बचानी ग़रीब की
उसको किसी अमीर से तो प्यार हो गया
इस खेल में तो जान है जानी ग़रीब की
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