रहती थी इक पहाड़ पे रानी ग़रीब की
तुम सुन के क्या करोगे कहानी ग़रीब की
उस ने दिया था मुझ को जो मिट्टी का इक चराग़
अब भी है मेरे पास निशानी ग़रीब की
अल्लाह जाने कौन सा ग़म था उसे मगर
कल रो रही थी ज़ोर से नानी ग़रीब की
बेटी की उस की आज तो बारात आई है
इज़्ज़त है सब को आज बचानी ग़रीब की
उस को किसी अमीर से तो प्यार हो गया
इस खेल में तो जान है जानी ग़रीब की
— Muneer shehryaar















