लगेगी ये झूठी मेरी बात तुम को
कि मैं माँगता हूँ दिन-ओ-रात तुम को
मैं कैसे बताऊँ कि डरता बहुत हूँ
बुरे लग न जाएँ ये जज़्बात तुम को
मैं मिट्टी का बर्तन, तुम्हें कैसे भाता
हिफाज़त की जो होतीं आफा़त तुम को
मुझे तो कहीं भी मुयस्सर नहीं है
दिया है जो मैं ने ऐ हज़रात तुम को
कभी भीड़ में क्यूँ नहीं कहते अपना
बुलानी नहीं क्या ये बारात तुम को
मिलेंगे ये कह कर कहाँ चल दिए तुम
नहीं भायी लगती मुलाक़ात तुम को
कहानी ख़तम चाहती हो यहीं क्या
यहीं क्या, है करनी शुरुआत तुम को
— Naveen mahor















