जो उधर था, इधर नहीं होता
घर नया, कोई घर नहीं होता
बैठते हों न पंछी ही जिस पर
वो शजर तो शजर नहीं होता
ग़म तो ये है, ग़मो का बँटवारा
क्यूँ जिगर तोलकर नहीं होता
दिन में लगता है रात आ जाए
रात में भी बसर नहीं होता
— Naveen mahor
घर नया, कोई घर नहीं होता
बैठते हों न पंछी ही जिस पर
वो शजर तो शजर नहीं होता
ग़म तो ये है, ग़मो का बँटवारा
क्यूँ जिगर तोलकर नहीं होता
दिन में लगता है रात आ जाए
रात में भी बसर नहीं होता
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