“चाय”
सड़क के किनारे पे उगते हुए और कहीं आसमानों को छूते हुए परबतों और पहाड़ों पे ढलती हुई बारिशों की बदौलत पले चंद पेड़ों के बागान से
कितने मीलों के तन्हा सफ़र तय किए
कितनी झीलों के सागर के दरिया के पानी को पीते हुए
कहीं आँधियों से उलझते हुए कहीं शांत नदियों के वातास पीते हुए
कितने गाँवों से शहरों से लहरों से होते हुए
कहीं टूट कर के कहीं फूट कर के
कहीं पे मशीनों कहीं पे वो फ़नकार मानिंद मज़दूर हाथों की सतहों पे रगड़े हुए
गलियारों में कैफ़े में सड़कों पर घर की रसोई में दफ़्तर में होटलों में, मिट्टी के लोहे के बादल नुमा चायदानों में उबलती मचलती हुई
सजी धजी कीमती काँच की प्यालियों से कहीं झाँकती मुस्कुराती हुई और कहीं काग़ज़ी कप में बेजान सोई हुई हम को उस अपने पीले कहीं लाल रंग की कहीं पर सफ़ेदी के रंगों से पैदा हुई एक मद्धम सी आवाज़ देकर बुलाती हुई
एक चाय जो मिल जाए तो फिर शराबी भला कोई क्यूँ हो















