हक़ीक़त हो या कोई दास्ताँ हो तुम
रुमूज़-ए-क़ुदरत-ए-हक़ में निहाँ हो तुम
कहीं तुम तो नहीं हो ना-ख़ुदा मेरा
ख़ुदा जैसी ही मुझ पर मेहरबाँ हो तुम
कुछ इतनी है तुम्हारी अहमियत जानाँ
मैं शाइर हूँ अगर उर्दू ज़बाँ हो तुम
मिरी परवाज़ की सरहद नहीं कोई
मैं वो शाहीन जिस का आसमाँ हो तुम
सनम ये ज़िंदगी संगीत जैसी है
बराए-ख़ास मेरे हम-नवाँ हो तुम
ये रुत्बा भी किसी से कम नहीं होता
किसी अहल-ए-सुख़न की जान-ए-जाँ हो तुम
मिरे नज़दीक हो कर भी जुदा क्यूँ हो
जुदा हो कर भी क्यूँ मुझ में निहाँ हो तुम
मुझे शायद ज़फ़र में उम्र लग जाए
ब-ख़ुद ही एक मुश्किल इम्तिहाँ हो तुम
बदन तो है मगर दिल और कहीं गुम है
ख़ुदा जाने 'मिलन' जाने कहाँ हो तुम















