नफ़रत के ज़माने में मोहब्बत के बराबर
ये ज़िंदगी बरसात है तुम छत के बराबर
तुम साथ में होती हो तो लगती है ये दुनिया
वल्लाह किसी ग़ैरत-ए-जन्नत के बराबर
आशिक़ के लिए लाज़िमी है यार-परस्ती
माशूक़ का फ़रमान शरीअत के बराबर
रखने को तो क़दमों में जहाँ रख दूँ तुम्हारे
मेआ'र तो ले आओ हक़ीक़त के बराबर
जीने के लिए काफ़ी हैं एहसास तुम्हारे
यादें हैं तुम्हारी मुझे क़ुर्बत के बराबर
तुम आदत अगर होतीं भुला देता मैं जानाँ
पर तुम तो मोहब्बत हो मिरी लत के बराबर
आशिक़ के लिए इश्क़ परस्तिश है ख़ुदा की
दुनिया के लिए इश्क़ बग़ावत के बराबर
हर बार कुछ इक पल के लिए वस्ल हमारा
हर बार समय हिज्र का इद्दत के बराबर
मंज़ूर है बद-नामी 'मिलन' नाम से तेरे
पर नाम किसी और का तोहमत के बराबर















