ज़बाँ से हक़ीक़त को कहना बचा है
हमें अब अकेले ही रहना बचा है
ये मरहम ये पट्टी ये झूठी दुआएँ
है गहरा ज़रा ज़ख़्म सहना बचा है
ये घर का तसव्वुर कि मिटता नहीं है
इमारत पुरानी है ढहना बचा है
सभी शौक़ मेरे ख़ुदा के हवाले
मेरा दिल है गहना वो गहना बचा है
मैं बेबाक बारिश सा गिरता रहा हूँ
जो दरिया हूँ मैं अब तो बहना बचा है
— Piyush Mishra 'Aab'















