साथ मेरे चल रही है आलम-ए-रुस्वाइयाँ
देख मेरे इस बदन को खा रही तन्हाइयाँ
मैं खड़ा हूँ कश्ती पर जो कश्ती है मझधार में
साथ मेरे बह रही है यादों की पुरवाइयाँ
देख जो पाए नहीं ये मुफ़लिसों का हाल तो
ऐ ख़ुदा तू छीन ले इन आँखों की बीनाइयाँ
लिख न पाए जो अगर ये मुफ़लिसों की मुफ़लिसी
ऐ ख़ुदा तू छीन ले ये शा'इरी तुरपाइयाँ
ज़िंदगी के रहगुज़र में रहते थे परछाई सी
पास आए तो डरूँ मैं अब तेरी परछाइयाँ
Read Full